गुरुवार, 10 मार्च 2011

तुम्हारा रूप
तुम्हारा सोंदर्य
तुम्हारी बातें
तुम्हारी मुस्कान
तुम्हारे होने का अहसास
मुझे करता है महसूस
की मै जीवित हूँ
और न तमन्ना है
न आरजू
जाने कहाँ से उपजती है
यह कविता
संतुस्ट नही हो पाता
तुमपर लिख कर कविता
तलाशता रहता हूँ शब्द
लगातार
की पिरों सकूं शब्दों में
अपने भाव
पर हर बार कुछ रह जाता है
लिखते हुए तुमपर
मै खो जाता हूँ अक्सर
अपने से भी दूर
सायद इसी समय
मै होता हूँ जीवित
इसी समय मै जानता हूँ प्रेंम को
और महसूस करता हूँ
तुम्हारे वजूद को
जाने किस लोक में पहुंच जाता हूँ
जहाँ न तुम होती हो न मै

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