भागता हूँ मै लगातार
जाने किन बिम्बों के पीछे
जाने कब तक चलेगी यह दोड़
जाने किस की है तलाश
की खत्म ही नही होती प्यास
बढती जाती है हर बार
कुछ पाने के बाद
एक नई जरूरत उभर कर आती है सामने
मै लगता हूँ उसके पीछे दोड़
आज भी दोड़ ही रहा हूँ
जाने कब और कहाँ खत्म होगी यह दोड़
बटोर रहा हूँ जहाँ भर की खुशियाँ
पर यह प्यास है की बुझती नही
मै दोड़ रहा हूँ तृप्ति के पीछे
देवालयों में जाता हूँ
दान करता हूँ
और जाने क्या क्या
पर नही होती है आत्मा तृप्त
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें