गुरुवार, 20 जनवरी 2011

आह! तुम्हारा
अनुपम रूप
तुम्हारी स्निग्ध महक
बोलती आखें
मासूम भोलापन
चंचल बचपना
विराट ममत्व
मै मस्त लापरवाह
अपने को सोंप कर
तुम्हे बेबाक
जीना चाहता हूँ
तुम्हारे भोलेपन में

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