तुम्हरे कपोलों से लुढकते आसूं
मोती से नजर आते हैं मुझे
क्या पता यह नजरों का दोष है
या मै नही लगा पा रहा हूँ सही कीमत इनकी
तुम तो जानती हो की क्या हो सकती है कीमत इसकी
मेरे लिए
शब्द नही थे मेरे पास सो मोती कह दिया
जाने क्यों अनमोल नही कहना चाहता
सायद अनमोल में भी मोल तो है ही
अब लाचार हूँ मै इनकी कीमत व्यक्त करने में
मुझे रहने दो इस लाचारी में
गुरुवार, 10 मार्च 2011
जाने क्या है जीवन
भागता हूँ मै लगातार
जाने किन बिम्बों के पीछे
जाने कब तक चलेगी यह दोड़
जाने किस की है तलाश
की खत्म ही नही होती प्यास
बढती जाती है हर बार
कुछ पाने के बाद
एक नई जरूरत उभर कर आती है सामने
मै लगता हूँ उसके पीछे दोड़
आज भी दोड़ ही रहा हूँ
जाने कब और कहाँ खत्म होगी यह दोड़
बटोर रहा हूँ जहाँ भर की खुशियाँ
पर यह प्यास है की बुझती नही
मै दोड़ रहा हूँ तृप्ति के पीछे
देवालयों में जाता हूँ
दान करता हूँ
और जाने क्या क्या
पर नही होती है आत्मा तृप्त
तुम्हारा रूप
तुम्हारा सोंदर्य
तुम्हारी बातें
तुम्हारी मुस्कान
तुम्हारे होने का अहसास
मुझे करता है महसूस
की मै जीवित हूँ
और न तमन्ना है
न आरजू
जाने कहाँ से उपजती है
यह कविता
संतुस्ट नही हो पाता
तुमपर लिख कर कविता
तलाशता रहता हूँ शब्द
लगातार
की पिरों सकूं शब्दों में
अपने भाव
पर हर बार कुछ रह जाता है
लिखते हुए तुमपर
मै खो जाता हूँ अक्सर
अपने से भी दूर
सायद इसी समय
मै होता हूँ जीवित
इसी समय मै जानता हूँ प्रेंम को
और महसूस करता हूँ
तुम्हारे वजूद को
जाने किस लोक में पहुंच जाता हूँ
जहाँ न तुम होती हो न मै
तुम्हारा सोंदर्य
तुम्हारी बातें
तुम्हारी मुस्कान
तुम्हारे होने का अहसास
मुझे करता है महसूस
की मै जीवित हूँ
और न तमन्ना है
न आरजू
जाने कहाँ से उपजती है
यह कविता
संतुस्ट नही हो पाता
तुमपर लिख कर कविता
तलाशता रहता हूँ शब्द
लगातार
की पिरों सकूं शब्दों में
अपने भाव
पर हर बार कुछ रह जाता है
लिखते हुए तुमपर
मै खो जाता हूँ अक्सर
अपने से भी दूर
सायद इसी समय
मै होता हूँ जीवित
इसी समय मै जानता हूँ प्रेंम को
और महसूस करता हूँ
तुम्हारे वजूद को
जाने किस लोक में पहुंच जाता हूँ
जहाँ न तुम होती हो न मै
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